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बिहार MLC चुनाव का गणित तेज, 11 सीटों पर NDA भारी, महागठबंधन की नजर एक सीट पर

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बिहार में विधान परिषद की 11 सीटों को लेकर सियासी गणित तेज हो गया है। एनडीए को बहुमत का फायदा मिलता दिख रहा है, जबकि महागठबंधन की नजर कम से कम एक सीट सुरक्षित करने पर है।

आलम की खबर, पटना: बिहार की सियासत में राज्यसभा चुनाव के बाद अब विधान परिषद यानी MLC चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने समीकरण साधने में जुट गए हैं। जून 2026 में खाली होने वाली सीटों और दो उपचुनावों को मिलाकर कुल 11 सीटों पर मुकाबले की तस्वीर बन रही है। मौजूदा विधायकों की संख्या के आधार पर एनडीए यहां स्पष्ट बढ़त में दिखाई दे रहा है, जबकि महागठबंधन के सामने सीमित संख्या के बावजूद रणनीतिक लड़ाई की चुनौती है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि इस चुनाव के जरिए सहयोगी दलों को कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा और कौन-सी पार्टी अपने सहयोगियों को संतुष्ट कर पाएगी।

11 सीटों पर चुनाव, सियासी जोड़-घटाव शुरू

बिहार विधान परिषद की जिन सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें कुछ सीटें कार्यकाल समाप्त होने से खाली होंगी, जबकि दो सीटों पर उपचुनाव की स्थिति बनी है। इस वजह से कुल 11 सीटों का समीकरण काफी अहम हो गया है।

इन सीटों को लेकर सिर्फ संख्या बल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी जुड़ा हुआ है। किसे टिकट मिलेगा, कौन सहयोगी दल को समायोजित करेगा और किसे संगठनात्मक इनाम मिलेगा—इन सवालों ने अंदरखाने की राजनीति को और गर्म कर दिया है।

विधायकों की संख्या में NDA को बढ़त

विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के हिसाब से एनडीए इस चुनाव में सबसे मजबूत स्थिति में माना जा रहा है। गणित बताता है कि सत्ता पक्ष आराम से अधिकांश सीटों पर कब्जा जमा सकता है। यही वजह है कि एनडीए के भीतर भी अब असली लड़ाई सीटों के बंटवारे और दावेदारों की दावेदारी को लेकर मानी जा रही है।

बीजेपी, जेडीयू, लोजपा (रामविलास) और अन्य सहयोगी दलों के बीच इस बात पर मंथन चल रहा है कि किसे कितनी सीटें मिलें और किस चेहरे को परिषद भेजा जाए।

महागठबंधन की नजर कम से कम एक सीट पर

दूसरी तरफ विपक्षी महागठबंधन का गणित अपेक्षाकृत सीमित है, लेकिन पूरी तरह कमजोर नहीं। विपक्ष के पास इतनी संख्या है कि वह कम से कम एक उम्मीदवार को विधान परिषद भेजने की स्थिति में दिख रहा है। इसी वजह से विपक्ष के भीतर यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि उस एक सीट पर दावेदारी किसकी बनेगी।

राजद के पास सबसे बड़ा आधार होने के कारण स्वाभाविक रूप से पहली दावेदारी उसी की मानी जा रही है। हालांकि सहयोगी दलों की भूमिका को देखते हुए यह संभावना भी बनी हुई है कि यह सीट किसी सहयोगी को राजनीतिक संतुलन के तहत दी जा सकती है।

AIMIM और छोटे दलों की भूमिका चर्चा में

इस चुनाव में एआईएमआईएम और बसपा जैसे छोटे दलों की भूमिका भी चर्चा में है। संख्या के हिसाब से ये दल विपक्षी खेमे की कुल ताकत बढ़ाते हैं और इसी वजह से उनका महत्व बढ़ गया है। यही कारण है कि सियासी हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या विपक्ष अपने सहयोगियों को साधते हुए कोई बड़ा संकेत देगा या फिर मुख्य दल अपने ही उम्मीदवार को प्राथमिकता देगा।

यह भी माना जा रहा है कि हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद सहयोगी दल अब अपने हिस्से की राजनीतिक भागीदारी को लेकर ज्यादा सक्रिय हो गए हैं।

सत्ता पक्ष में सहयोगियों की दावेदारी भी अहम

एनडीए के भीतर भी स्थिति पूरी तरह आसान नहीं है। भले ही संख्या बल उसके पक्ष में हो, लेकिन सीटों के बंटवारे में कई दल अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। खासकर वे दल, जिन्होंने हालिया चुनावी या संसदीय समीकरणों में अपनी उपयोगिता साबित की है, अब परिषद चुनाव में उसका लाभ चाहते हैं।

ऐसे में यह चुनाव केवल विपक्ष बनाम सत्ता पक्ष की लड़ाई नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर संतुलन साधने की भी परीक्षा बनता जा रहा है।

कई सीटों पर ‘समायोजन’ की राजनीति संभव

बिहार की राजनीति में विधान परिषद चुनाव हमेशा से सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि संगठनात्मक और गठबंधन प्रबंधन का माध्यम भी रहा है। कई बार ऐसे नेताओं को परिषद भेजा जाता है, जिन्हें सरकार या संगठन में बड़ी भूमिका देनी होती है, लेकिन वे किसी सदन के सदस्य नहीं होते।

इस बार भी कुछ सीटों को लेकर ऐसा ही समीकरण बनने की चर्चा है। इसलिए कई नाम खुले तौर पर सामने नहीं आने के बावजूद अंदरखाने सक्रिय बताए जा रहे हैं।

विपक्ष के लिए रणनीति, सत्ता पक्ष के लिए संतुलन की परीक्षा

महागठबंधन के लिए यह चुनाव अपनी एकजुटता और रणनीतिक समझ दिखाने का मौका है, जबकि एनडीए के लिए यह अपने सहयोगियों को साधने और असंतोष से बचने की चुनौती है। यदि विपक्ष एक सीट भी मजबूती से जीतता है, तो वह इसे मनोवैज्ञानिक जीत के रूप में पेश करेगा। वहीं सत्ता पक्ष ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर अपनी संगठनात्मक पकड़ का संदेश देना चाहेगा।

MLC चुनाव से आगे की राजनीति का संकेत

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह चुनाव सिर्फ परिषद की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। इसके जरिए आने वाले समय में बिहार की सत्ता, गठबंधन और नेतृत्व को लेकर भी कई संकेत मिल सकते हैं। कौन-सा दल किसे आगे बढ़ाता है, किसे किनारे करता है और किसे राजनीतिक इनाम देता है—यह सब आने वाले बड़े राजनीतिक समीकरणों की झलक माना जाएगा।

फिलहाल इतना तय है कि बिहार में अब राज्यसभा के बाद MLC चुनाव ने नई सियासी हलचल पैदा कर दी है और अगले कुछ हफ्तों तक सीटों के इस गणित पर सबकी नजर बनी रहेगी।

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